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BRICS: वैश्विक व्यवस्था में अवसर और चुनौतियाँ

BRICS-Summit-2026-Delhi

भारत की अध्यक्षता में 18वें ब्रिक्स सम्मेलन के लिए राजधानी दिल्ली में मंच सज चुका है,वैश्विक नेताओं का भारत आना शुरू हो गया है। ईरान,यूएसए इसराइल संघर्ष के बीच  ब्रिक्स सम्मेलन ने वैश्विक स्तर पर इसे और भी चर्चा का विषय बना दिया है।

यह 11 देशों भारत,चीन, इंडोनेशिया , ब्राज़ील रूस ,इथियोपिया , मिस्र  , ईरान , दक्षिण अफ्रीका , सऊदी अरब यूएई  के समूह से अधिक, विश्व की बड़ी आबादी के लिए एक आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए मंच भी है।

इसी मंच से ब्रिक्स देशों के पास आपसी भू- राजनीतिक चुनौतियों को दूर करने और आर्थिक- सामाजिक  विकास तथा वैश्विकरण को मज़बूत करने के लिए अवसर भी है। आइए इस लेख में विस्तार पूर्वक समझते हैं- ब्रिक्स देशों के पास अवसर और चुनौतियाँ के बारे में।

ब्रिक्स देशों के पास अवसर

ग्लोबल साउथ भू राजनीतिक व्यवस्था को बढ़ाना

सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व व्यवस्था पश्चिम केंद्रित बन कर रह गया है। सुपर पॉवर अमेरिका इस केंद्र का बॉस बना हुआ है। आईएमएफ हो या संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद में अमेरिका का प्रभाव कम नहीं हो रहा है। पश्चिम केंद्रित व्यवस्था को ब्रिक्स देश आपसी सहयोग और साझेदारी से एक सेंट्रिक पॉवर के सामने तथा विश्व के अन्य देशों के सामने एक समानांतर विकल्प के तौर पर एक व्यवस्था दे सकते हैं तथा जो पश्चिम केंद्रित संस्थानों में ब्रिक्स देशों के साथ-साथ आर्थिक- सामाजिक तौर पर पिछड़े विकासशील देशों के लिए एक सुधार की आवाज़ भी बन सकते है।

आर्थिक- सामाजिक विकास की व्यापक संभावनाएं

ब्रिक्स वैश्विक आबादी में लगभग 49.5 प्रतिशत की हिस्सेदरी रखता है जो ये दर्शाता है कि दुनिया की आबादी का बड़ा भाग ब्रिक्स मंच पर है।

इसी आबादी के दम पर ब्रिक्स एक वैश्विक आर्थिक शक्ति बन सकते है। भारत, चीन, ब्राजील, रूस समेत अन्य ब्रिक्स देश डॉलर के सामने एक समानांतर ब्रिक्स मुद्रा प्रणाली शुरू कर सकते है, जिससे ब्रिक्स देशों को आपसी व्यापार के लिए डॉलर यानी पश्चिमी मुद्रा से निर्भरता कम कर सके। ब्रिक्स के आर्थिक तौर पर मज़बूत देश अपने सहयोगी ब्रिक्स देशों में निवेश के द्वारा आर्थिक विकास में सहयोग कर सकते हैं। इस बड़ी आबादी को कुशल मानव संसाधन में बदल कर “प्रवास” के द्वारा आर्थिक सामाजिक विकास को गति दिया जा सकता हैं।

वैश्विक मंच पर ब्रिक्स देशों की आवाज़ 

21वीं शताब्दी  तेज़ी से जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रहा है, जिससे विकसित देशों से ज़्यादा विकासशील देश प्रभावित होने वाले हैं। विकासशील देशों को खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में परेशानी झेलनी पड़ेगी। ब्रिक्स आपसी सहयोग से दुनिया के विकासशीत देशों के सामने आर्थिक संकट के लिए ज़िम्मेदारी और आर्थिक सहयोग के लिए प्रतिबद्ध कर सकता है। पश्चिम केंद्रित संस्थाओं  के सामने इन देशों को ब्रिक्स का समर्थन और आवाज़ के लिए एक मंच दे सकता है।

भारत के लिए आर्थिक और सामाजिक और भू- राजनीतिक अवसर।

भारत की भू- राजनीतिक नीतियां तटस्थ रही है पर इसके बावज़ूद ब्रिक्स का ये मंच भारत की शक्ति को बढ़ाने के लिए कारगर है। भारत अपनी आबादी के लिए वीज़ा में छूट की माँग कर सकता है।अपने समानता और मानव अधिकारों के  प्रति वचनबद्ध सोच और स्वतंत्रता और संप्रभुता के बदौलत वैश्विक स्तर पर एक शांति का प्रतीक बन सकता है। ब्रिक्स देशों के बीच पाकिस्तान के आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर सहयोग मांग सकता है।

 

ब्रिक्स के सामने चुनौतियां-

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ना कोई किसी का दोस्त होता है और ना लंबे समय तक दुश्मन, होती है तो आपसी सहयोग। ब्रिक्स ऐसे ही आपसी सहयोगी देशों का समूह है, जिसके सामने अपनी आंतरिक चुनौतिया के साथ अपने ब्रिक्स देशों साथ सीमा विवाद और कूटनीतिक की लेकर टकराव हैं।

भारत और चीन ब्रिक्स के देशों के बीच आबादी के स्तर पर हो या आर्थिक सामाजिक तौर पर दोनों देश अहम स्थान रखते हैं, लेकिन दोनों की विदेश नीति, आर्थिक विकास की स्थिति और भू- राजनीतिक अक्सर दोनों के बीच तनाव का कारण बनती है

चीन का सीमा विस्तारवादी नीति, भारत की अपनी आंतरिक संप्रभुता के लिए ख़तरनाक साबित हो रही है। पाकिस्तान के प्रति उसका सहयोग भारत के लिए चुनौती बना हुआ है। भारत और चीन के बीच बढ़ता व्यापार घटा भारत के लिए के मुख्य आर्थिक कारण बना हुआ है।

रूस- यूकेन संघर्ष के बीच भारत के लिए अपनी तटस्थ नीति को बनाए रखना कठिन हो चला है। एक तरफ़ पश्चिमी सहयोगियों के साथ बनाए रखना दूसरी तरफ़ दशकों का रूस और भारत के आपसी संबंधों को बनाए रखना।

चीन की आर्थिक नीतिया और तेज़ी से विस्तारवादी मंशा ब्रिक्स को कहीं चाइना केंद्रित ना  कर दे ये भी एक चुनौती है।

 

निष्कर्ष

ब्रिक्स देशों के बीच भले टकवार या उनके अपने पड़ोसियों से विवाद है, पर सभी देशों के बीच आपसी समन्वय से ब्रिक्स ख़ुद को पश्चिम देशों के संगठनों के समानांतर खड़ा करके मोनोपॉली खत्म कर सकते हैं। ब्रिक्स देश यदि आपसी विवादों को सैन्य संघर्ष के बजाए बातचीत से हल करे तो ब्रिक्स एक मज़बूत स्थिति में रहेगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था में हो या भू राजनीतिक स्तर पर छोटे देशों के लिए एक सुधार की माँग और सहयोग करने वाला मंच बन सकता हैं। ब्रिक्स आपसी संबंधों की अहमियत को समझ कर अन्य देशों को भी ब्रिक्स में शामिल होने के लिए प्रेरित कर सकता है जो इसे वैश्विक स्तर पर और मज़बूत करेगा।

 

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